जड़ता
से ज्यादा जकड़न का अनंत विस्तार
काठगोदाम
प्रसिद्द शिक्षाविद, चिंतक और कथाकार कृष्ण
कुमार का कहानी संग्रह है। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस संग्रह मे कृष्ण
कुमार जी की छोटी बड़ी कुल मिलाकर 17 कहानियाँ शामिल हैं। हिन्दी जगत मे कृष्ण
कुमार जी की छवि एक महत्वपूर्ण शिक्षाविद और हिन्दी चिंतक के रूप में रही है।
हिन्दी पाठकों से कृष्ण कुमार जी का परिचय एक कथाकार से पहले या कहें कि साथ-साथ दो
और रूपों मे रहा है। एक तो शिक्षाविद के रूप में , जहां वे
भारत के शैक्षिक विकास की नीतियों पर काम कर रहे थे। जिसमे एनसीईआरटी जैसे प्रशासकीय दायित्व मे रहने के साथ ही ‘विचार का डर’ , ‘राज समाज और शिक्षा’ , ‘political agenda of education’ और ‘social character of learning’ जैसी पुस्तकों की
मुख्य भूमिका रही है। कृष्ण कुमार जी का दूसरा परिचय ‘चूड़ी बाजार मे लड़की’ के लेखक के रूप मे दिया जा सकता
है। चूड़ी बाजार मे लड़की एक ऐसी पुस्तक है जिसमे , भारतीय
सामाजिक संरचना मे स्त्री पुरुष के पारस्परिक संबधों की पड़ताल ही नहीं की गयी है
एक लड़की के स्त्री बनने या कि बना दिये जाने की त्रासदी भी व्यक्त की गयी है। यह
पुस्तक इसलिए भी रेखांकित की जानी चाहिए क्योंकि यही वह पुस्तक है जिसके माध्यम से
हिन्दी के व्यापक पाठक समुदाय का परिचय कृष्ण कुमार के लेखन से हुआ। परिचय के साथ
ही लोकप्रियता और विश्वसनीयता भी हासिल हुई।
यूं तो काठगोदाम से पहले कृष्ण कुमार जी
के ‘त्रिकाल दर्शन’ और नीली आँखोंवाले बगुले’ नाम से दो कहानी संग्रह और प्रकाशित हो चुके हैं लेकिन काठगोदाम नामक
संग्रह मे वे जिस कथा-संरचना को लेकर उपस्थित होते हैं वह इससे पूर्व के कहानी
संग्रहों मे नहीं दिखाई देती। पिछले संग्रहों को पढ़ने के बाद इस संग्रह को पढ़ते
हुये ऐसा लगता है जैसे वे दोनों संग्रह इस संग्रह की पृष्ठभूमि के रूप मे मौजूद
हों। समीक्ष्य संग्रह की कहानियों को पढ़ते हुये जो बात सबसे पहले ध्यान में आती है
वह यह कि यह संग्रह 21वीं सदी के भारतीय सामाजिक-राजनैतिक ढांचे की कथा कहने वाला
संग्रह है। इस संग्रह की कहानियाँ भूमंडलीकरण और उत्तर-पूंजीवादी संस्कृति के
विकसित होने से पहले नहीं लिखी जा सकती थीं। इन कहानियों में मौजूद भारतीय
सामाजिक-राजनैतिक ढांचा,उसके पात्र और उनकी जीवन स्थितियाँ
21वीं सदी की हैं। दूसरी बात यह कि ये कहानियाँ किसी खास ढांचे में न बंधकर भारतीय
जीवन यथार्थ के विविध पहलुओं की कथा कहती
हैं। यह संग्रह कथाकार के व्यापक जीवननुभाव की तरफ तो हमारा ध्यान ले ही जाता है
उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता और वर्गचेतना को भी स्पष्ट करता है।
इस संग्रह की कहानियों को मोटे तौर पर
दो भागों में बांटकर पढ़ना समझना चाहिए। एक भाग में वे कहानियाँ जो भारतीय समाज के
सामाजिक ताने-बाने में मौजूद शोषण,दमन
और उत्पीड़न की बातें करती हैं। दूसरे में वे जो भूमंडलीकरण और उत्तर-पूंजीवादी
संस्कृति से बने मध्यवर्गीय जीवन की कथा कहती हैं। ऐसा नहीं है कि ये संग्रह में
किसी तरह की मंशा से दर्ज किया गया हो, लेकिन इन्हे पढ़ते
हुये यह विभेद दिखाई देता है। भारतीय समाज में मौजूद शोषण,दमन
और उत्पीड़न को समझने के लिए और बहुत हद तक अपने समय-समाज को भी समझने के लिए संग्रह के शीर्षक वाली कहानी का अंतिम पैरा
मुझे ‘मास्टर की’ की तरह लगता है। पैरा
इस तरह है- “हमारा समाज तो कटी हुई मरी लकड़ियों का गोदाम
है। लोग कहते है, बहुत कुछ बदल चुका है, बहुत कुछ बदल रहा है। आप मेरी शिक्षक है, बताइये, मुझे क्यों नहीं दिख रहा बदलाव। मुझे सिर्फ जड़ता क्यों दिखती है, और जड़ता से भी ज्यादा जकड़न का अनंत विस्तार दिखता है। यह भी क्या मेरी हि
दृष्टि का दोष है? यह रिफ्रेशर कोर्स का उदाहरण है। कोर्स
सिर्फ अनुसूचित जाति लेक्चररों के लिए है। क्या औचित्य है उन्हे अलग से बुलाने का? उन्हे पढ़ाने के लिए बुलाये गए लगभग सारे रिसोर्स पर्सन ऊंची जातियों के
हैं”। यूं कहानी
में तो यह बात सुशीला बहनजी से कहानी की नैरेटर कह रही है,लेकिन
उसकी यह स्वीकृति कथाकार की भी स्वीकृति है और स्वीकृति से ज्यादा हमारे समय-समाज
का सच है। अभी डॉ. पायल तड़वी की आत्महत्या के बाद देश भर के बौद्धिक तबके में जिस
तरह की बहस चल रही है उसमें यह माना जा रहा है कि इस तरह की घटनाओं के पीछे बहुत
हद तक संस्थानों में होने वाली मानसिक प्रताड़ना जिम्मेदार है। एक खास वर्ग से आने
वाले कई छात्र-छात्राओं ने भी स्वीकार किया कि शिक्षण संस्थानों से लेकर हर जगह, हर स्तर पर तमाम तरीके के डिस्कृमिनेशन उनके साथ लगातार होता है। इस स्वीकृति और सच के साथ जब हम इस संग्रह के
पास जाते हैं तो ‘विजयपताका’ के दिलीप से हमारा सामना
होता है, ‘दो सहेलियाँ’ की मीरा और पद्मिनी की वार्ता सुनाई पड़ती है और काठगोदाम की नैरेटर और
सुशीला बहनजी से मुलाक़ात होती है। इन पात्रों से मिलने,इन्हे
खोजने और इनकी सामाजिक उपस्थिति देखने वाला व्यक्ति यह मान लेगा कि यकीनन अभी कुछ
भी नहीं बदला। अभी तो यह वही समाज है जिसमें रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसे लोग
आत्महत्या करने को मजबूर होते हैं। जिस देश की शिक्षण संस्थाओं से लेकर कार्य करने
कि जगहों तक में कास्ट, जेंडर,रिलीजन, क्षेत्र और न जाने किन-किन आधारों पर डिस्क्रीमिनेशन हो रहा हो, जिस समाज में आज भी जन्म के साथ ही एक खास किस्म का गौरवबोध या हीनताबोध
भर दिया जाता हो वहाँ कहाँ कुछ बदला है? शोषण का रूप भले बदल
गया हो,शोषण तो जस का तस मौजूद है।
इस तरह के शोषण और उत्पीड़न की जड़ें बहुत
गहरे तक हमारे समाज में जमी हुई हैं। जाति,
धर्म, लिंग और क्षेत्रीयता के आधार पर जिस तरह का बहुस्तरीय
शोषण हमारे समाज में मौजूद है उस तरफ बहुत मजबूती से इस संग्रह की कई कहानियाँ
हमारा ध्यान खींचती हैं। ऐसा नहीं है कि उनपर
लिखने वाले कृष्ण कुमार जी पहले या अंतिम व्यक्ति हैं। लेकिन कृष्ण कुमार जी इस
शोषण की बहुस्तरीयता को समझने वाले कम लोगों में एक हैं। इस शोषण, दमन और उत्पीड़न की शुरुआत जबसे हुई है इसके खिलाफ बोलने और लिखने वाले
लोग भी तभी से मौजूद हैं। इसका आभास कृष्ण कुमार जी को भी है और मुझे भी। अगर ऐसा
न होता तो ‘दो सहेलियाँ’ जैसी कहानी की
रचना संभव ही न होती। उक्त कहानी में मीरा और पदम्नी के बीच हो रहे संवाद शोषण और
उत्पीड़न की सतत मौजूदगी का प्रमाण देते हैं।
कहानी का सत्य यह है कि नैरेटर शहर से
सटे हुये किसी
ग्रामीण इलाके में कोई सर्वे करने गया हुआ है। थककर पास के एक मंदिर में लेट गया।
लेटने के साथ ही उसे नींद आ गयी। जागने पर उसे कुछ आवाजें सुनाई देने लगीं। मानवीय
स्वभाव वस वह उन्हे सुनने लगा। कहने की जरूरत नहीं कि वे आवाजें भक्त कवयित्री
मीरा और रत्नसेन की रानी पद्मनी की हैं। वे आपस में बात कर रही हैं,किसी ताजी घटी हुई घटना पर। बात करते हुये वे अपने समय से लेकर अब तक के कई
समयों की यात्रा करती हैं। मीरा पद्मनी से कहती हैं- “क्यों आज तुम्हें बहुत
फर्क लगता है? मुझे तो नहीं लगता। वैसे भी काल स्थिर है। लगता है बढ़
रहा है, पर यह भ्रम है। उसे कहीं भी पकड़ लो –आगे या पीछे। बीसवीं सदी जा रही है,हम तुम बैठी बातें कर रही हैं- कहाँ है काल”? इस काल की स्थिरता का संदर्भ आगे पद्मनी की बात से जोड़ने पर स्पष्ट होगा
की यह स्थिरता किस संदर्भ से कही जा रही है। पद्मनी कहती है- “मीरा, कुछ भी बदला नहीं दिखता मुझे। वे जगहें नहीं हैं, वे कपड़े नहीं हैं-बस! इस
हॉस्टल में लगाई जाने वाली आवाजें अलग होंगी, संगीत फर्क होगा। बस वे सब आसान रास्ता चुनेंगे। सिर्फ लड़के नहीं, प्रोफेसर,नेता,पुलिस,जज,वकील,पत्रकार- सब के सब आसान रास्ता चुनेंगे, क्योंकि वे औरत को सताना,सताना नहीं
मानते। वे तुम्हारी कविता पढ़ने के काबिल नहीं हैं”। मीरा और पद्मनी के बीच होने वाले संवादों में इसी तरह
हमारे समय-समाज का यथार्थ दर्ज हुआ है। कब यह कहानी का सच हमारे समय का सच बन जाता
है पता ही नहीं चलता। इसी तरह दूसरी कहानी है काठगोदाम। काठगोदाम कहानी नैरेटर के
नैनीताल प्रवास से शुरू होती है। वह डायरी लिख रही है और अपने छात्र जीवन के बारे
में विचार कर रही है। विचार करते हुये वह सुशीला बहनजी के अध्यापन जीवन के बारे
में विचार करती है और इस तरह वह अपने छात्र जीवन में प्रवेश कर जाती है। किसी भी
संस्था में जाति नामक कोढ़ किस तरह जकड़ा हुआ है यह कहानी इसी का बयान करती है। न तो
इस देश में सुशीला बहनजी अकेली हैं और न ही कथानायिका। यह एक वर्ग की कहानी है।
वर्गबोध और वर्ग-संघर्ष की। शिक्षण संस्थाओं में मौजूद क्लास डिस्क्रिमिनेशन की
जीवंत दास्तान इस कहानी में मौजूद है। छात्र-छात्रा के रूप में, कर्मचारी के रूप में, शिक्षक के
रूप में, या किसी भी रूप में एक वर्ग में जन्म लेने वाले इंसान
के साथ हर स्तर पर डिस्क्रिमिनेशन इस हद तक किया जाता है कि उस वर्ग के इंसान को
भीतर से यह लाग्ने लगता है कि वह उनके जैसा नहीं है जबकि उसे उनके जैसा होना
चाहिए। यह कहानी उस समय लिखी गयी थी जब इस देश ने किसी रोहित बेमुला के लिए संघर्ष
करना नहीं सीखा था, किसी डॉ. पायल तड़वी ने अपने साथ काम करने वालों से तंग
आत्महत्या नहीं किया था। ऐसा भी नहीं है कि यह सबकुछ आज होना शुरू हुआ है,यह अनादि काल से चला आ रहा है लेकिन जब लोगों ने संस्थाओं में हो रहे इस
तरह के डिस्क्रिमिनेशन की तरफ ध्यान नहीं दिया था उस समय यह कहानी उसके वीभत्स
परिणामों की तरफ इशारा कर रही थी।
इसी तरह के शोषण की गाथा
कहने वाली एक और कहानी इस संग्रह में प्रकाशित है ‘विजयपताका’ शीर्षक से। हमारे समाज में शोषण की जड़ें बहुत गहरे जमी
हुई हैं इसे कहने की जरूरत नहीं है। बच्चा जन्म लेता है तभी से उसे सिखाया जाने
लगता है कि उसे किसके साथ उठना-बैठना है, किसके साथ
खेलना है, किससे प्यार करना है किससे घृणा करनी है। तमाम तरह कि
शिक्षा के साथ ही उसे ये सारी शिक्षा भी मिलती चलती है। यानी जब वह सोचने-समझने की
स्थिति तक पहुंचता है तबतक उसकी एक खास किस्म की मानसिक कंडिशनिंग हो चुकी होती
है। मनोविज्ञान भी कहता है कि इस तरह की कंडिशनिंग को तोड़ पाना सबसे मुश्किल होता
है। इसी कंडिशनिंग में जी रहे बच्चों की कहानी है विजयपाताका। विजयपताका में एक
तरफ दिलीप है, दूसरी तरफ धनेन्द्र है। दिलीप के पिता पुलिस में नौकरी
करते हैं, धनेन्द्र भी रसूखदार परिवार से आता है। आर्थिक स्तर पर
दोनों लगभग समान हैं। बावजूद इसके धनेन्द्र क्लास में तमाम तरह की फब्तियाँ कसता
है। दिलीप के तन पर स्काई सार्जेंट की नई टीशर्ट देखकर धनेन्द्र को अच्छा नहीं
लगा। फिर क्या था, अपनी टोली के साथ आ गया। आगे क्या हुआ कहानी में सुनिए-“धनेन्द्र
अपनी बांह में एक भीगी हुई टीशर्ट झंडे की तरह उठाए मंदिर की परिक्रमा कर रहा था॥
लड़के उसके पीछे-पीछे चल रहे थे। बीच-बीच में रुककर वह लड़कों की तरफ सर मोड़ता और
बताता कि उसने कैसे निशाना लगाकर पत्थर मारा। टोली के सदस्य खिलखिलाकर बताते कि
फिर कैसे उन्होने दिलीप को घेरा, कैसे उसकी
टीशर्ट उतारी, कैसे उसे जमीन पर रौंदा, फिर कैसे वह घर की तरफ भागा”। अब सवाल उठता है कि एक ही क्लास में पढ़ने वाले एक ही उम्र के धनेन्द्र में
यह हिम्मत और यह हौसला कहाँ से आया? यह जो
जातीय गौरवबोध जन्म लेने के साथ ही भर दिया जाता है असल जड़ यही है। जबतक हम इसको
नहीं बादल पाते तबतक सुधार और मुक्ति की चाहे जितनी बातें कर लें वे कोरी गप्प ही
साबित होंगी।
इस संग्रह की कहानियों का
जो दूसरा संदर्भ बनता है वह भूमंडलीकरण और
बाजार की संस्कृति से बने भारतीय समाज का चित्र प्रस्तुत करता है। भूमंडलीय ज्ञान
और बाजारवादी संस्कृति ने मनुष्य को और ज्यादा यांत्रिक बनाया है। हमारा पारंपरिक
और देशज ज्ञानकांड कितना भी रूखा और उबाऊ क्यों न रहा हो इमोशनलेस कभी नहीं रहा।
बाजार और पूंजी ने इंसान को यंत्र में तब्दील कर दिया है। इस यांत्रिकता ने इंसान को पर्याप्त अकेला कर दिया है। चम्पाकथा कहानी का रविकांत जब पूछता है कि – “क्या
दिल्ली के लोगों को कभी यह सोचकर बेचैनी नहीं होती कि वे चौरासी के नवंबर के
स्वछ्न्द हत्यारों के साथ रहते हैं”? तो यह सवाल किसी व्यक्ति का किसी घटना से जुड़ा हुआ सवाल न होकर हमारे
समय-समाज का सवाल बन जाता है। अव्वल तो यह कि अब कोई इस तरह के सवाल भी नहीं
पूछता। जबकि सवाल पूछता हुआ मनुष्य ज्यादा भरोशे
का होता है। सवाल न पूछने की,प्रतिरोध न
करने की वजह से ही इस देश में 1984,1992 और 2002
जैसी घटनाएँ घटित हुई हैं। जिस समाज में भावनात्मक लगाव छीजता जाएगा वहाँ अकेलापन
ही बढ़ेगा। अकेलेपन का सबसे ज्यादा लाभ बाजार को मिलता है। इसीलिए वह ऐसे हथियार
प्रयोग में लाती जिससे इंसान को अकेला कर सके। वह एक ऐसा समाज बनाना चाहती है
जिसमें इमोशनल रिश्तों नातों के लिए कोई जगह शेष न रहे। सबकुछ यंत्रवत हो। यह
यांत्रिकता इस हद तक हावी होने की तरफ बढ़ रही है कि ‘त्रिकाल दर्शन’, ‘स्नानवार्ता’ ‘शरद की
दोपहर’ ‘प्रतिकार’ जैसी कहानी
संभव होती है। ‘शरद की दोपहर’ के दो
दोस्त इस बाजारवादी यांत्रिक व्यवस्था के शिकार नहीं तो और क्या हैं? प्रतिकार का कथानायक एक समय जिस कंपनी के लिए सबकुछ था, जिसकी मेहनत और कार्यशैली का ही कमाल था कि कंपनी ने आकाश छूआ। लेकिन
कंपनी के लिए जरूरी है उसकी लगातार वृद्धि। उस वृद्धि में जो व्यक्ति जबतक काम
लायक है तबतक वह सर आँखों पर, जिसदिन
उसकी जरूरत ख़त्म उसदिन के बाद उससे कोई रिश्ता नहीं। यही हुआ मैनेजर साहब के साथ।
स्नानवार्ता के माथुर और झा साहब इस यांत्रिक दुनिया के असल प्रतिनिधि बनकर सामने
आते हैं। इस तरह की बनने वाली दुनिया
मानवीय सभ्यता और संस्कृति से दूर जाने वाली दुनिया है। जिसकी तरफ यह संग्रह इशारा
करता है।
यह तो हुई इस संग्रह के दो
मुख्य संदर्भों की बात। इस संग्रह पर बात यहीं ख़त्म नहीं होती। इस संग्रह में ‘स्मार्ट सिटी’ , ‘दो दोस्त’, ‘रानी’ , ‘बाल दिवस का टिकट’ , ‘रोवो मत
रवि’, ‘बांस का कीड़ा’, ‘मातृध्वनि’ और ‘सुबह की सैर’ जैसी
कहानियाँ भी शामिल हैं। इन कहानियों में मानवीय विश्वास और सहजीविता की गर्माहट
मौजूद है। स्मार्ट सिटी कहानी कि मेघमाला जैसी संस्थाएं और उसमें कार्य करने वाले
लोग जिस जीवट से लगे हुये हैं वह प्रतिरोधी चेतना की एक बानगी पेश करता है। यह
कहानी भारतीय बुद्धिजीवियों के साथ सत्ता के रिश्ते कि कथा बयान करती है। कहानी का
सच यह है कि सत्ता जिस किसी को अपमानित करना चाहती है उसे सबसे पहले बुद्धिजीवी
करार देती है। आज आप उसे बदल कर पढ़ना चाहें तो ‘अवार्ड वापसी गैंग’ ‘खान मार्केट
गैंग’ या ‘टुकड़े –टुकड़े
गैंग’ पढ़ लें। सत्ताओं के अपमानित करने का यही तरीका मेघमाला
जैसी संस्थाओं के सदस्यों के साथ भी अपनाया जाता था। लेकिन वे लगे रहे, तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों में भी वे छुप-छुपाकर अपनी सभाएं करते रहे।
प्रतिरोध करते रहे। दो दोस्त नामक कहानी विश्वविद्यालयी जीवन पर केन्द्रित है।
जहां से यह कहानी बनती है वह संदर्भ यह है कि अचानक विश्वविद्यालय में कहीं से
बदबू आने लगती है। जैसे हरेक कार्य के लिए होता है इसके लिए भी कमेटी बना दी गयी।
कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया कि यह बदबू परिसर की परिधि पर स्थित आदिवासी मजदूरों
की बस्ती से आती है। बस्ती को उजाड़ने का आदेश दे दिया गया। उजड़ भी गयी लेकिन बदबू
आनी नहीं बंद हुई। बल्कि कहानी का सच तो यहाँ तक कहता है कि बदबू वहाँ
विश्वविद्यालय के पोर-पोर में बसी हुई है। छात्र डिग्री लेते हुये यह महसूस कर रहे
थे कि उनकी डिग्री से भी बदबू आ रही है। यह कहानी इसी तरह के बदबूदार परिसरों की
कथा कहती है और इस देश और समाज के शिक्षण संस्थानों की असलियत बयान करती है।
इस संग्रह में रानी, मातृध्वनि और बाल दिवस का टिकट जैसी कहानियाँ हैं जो उम्मीद और आशा की
कहानियाँ हैं। इनमे कुछ तो है जो जोड़ने की कोशिश करता है। इन कहानियों को पढ़ते
हुये कहानी पढ़ने का सुख मिलता है। सुकून मिलता है, कुछ देर ठहर जाने का मन करता है। इनमे रागतत्व की प्रधानता है। यह कथाकार
का आकांक्षित प्रदेश लगता है। रानी नामक कहानी मनुष्य और पशु के बीच के रिश्ते की
कहानी है।तो मातृध्वनि बाल मनोविज्ञान और माँ के रागवृत्त की कथा कहती है। बाल दिवस का टिकट पिता-पुत्र
के भावात्मक रिश्ते की कहानी है। कुल मिलाकर इन कहानियों में जो कुछ है हम असल में
वैसा ही सबकुछ चाहते हैं। यह हमारी आकांक्षा है। जो कि असलियत होनी चाहिए थी।
कृष्ण कुमार जी ने जीवन का
लंबा समय शिक्षा जगत के दायित्व में बिताया है। उनके अनुभव का एक बड़ा हिस्सा वहाँ
से आता है। उसका बहुत कुछ आभास इस संग्रह की कहानियों में बहुत साफ तौर पर देखने
को भी मिलता है। इन कहानियों में भारत की शिक्षण संस्थाओं का यथार्थ रूप दिखाई
देता है। संग्रह की लगभग सभी कहानियाँ शिक्षण संस्थानों से किसी न किसी रूप में
जुड़ी हुई हैं। शिक्षण संस्थाओं से जुड़ना अनिवार्यतः इस देश के युवा से भी जुड़ना
होता है। इस रूप में इनका एक पाठ युवापीढ़ी को केंद्र मे रखकर भी किया जा सकता है।
कृष्ण कुमार जी की ये कहानियाँ अपने कथारूप में भारत की प्राचीन कथा परंपरा की याद
दिलाती हैं। पंचतंत्र और हितोपदेश की कहानियों की तरह इनकी कहानियों में भी एक
कहानी के भीतर से कई-कई कहानियाँ निकलती हुई आगे बढ़ती है। कहानी के भीतर अचानक कोई
घटना-प्रसंग आ जाता है। कहानी अपना मूल छोडकर उसके विवरण में आगे बढ़ती चली जाती
है। अगर शुरू से मूल कहानी पकड़कर न चलें तो बीच-बीच में याद करना पड़ता है कि कहानी
शुरू कहाँ से हुई थी। यह शैली लंबी कहानियों में तो आसान लगती है लेकिन कृष्ण कुमार
जी ऐसा प्रयोग छोटी-छोटी कहानियों में भी करते चलते हैं। इस तरह का प्रयोग उन्हे
भारतीय कथाढांचा से सम्बद्ध रखता है जो समकालीन कहानी में दूसरे कथाकारों के पास
प्रायः नहीं मिलता। 21वीं सदी के भारतीय सामाजिक-संरचना की गझिन पड़ताल करने वाला
यह संग्रह हिन्दी कहानी के परिसर को और समृद्ध करता है। विमर्शों की दुनिया से
हटकर ये कहानियाँ जिन संदर्भों को उठाती हैं।उनपर
हिन्दी समाज को विचार-विमर्श करना चाहिए।
(यह आलेख तद्भव पत्रिका में पूर्व प्रकाशित है)