फुर्सत के मौसम में आग की कहानियां
हिन्दी
कहानी के वर्तमान परिदृश्य में जिस तरह का वैविध्य देखने को मिलता है वह हिन्दी
कहानी परंपरा से बहुत कुछ ग्रहण करने के बाद हासिल हुआ है। यह वैविध्य कथालेखन के
क्षेत्र में अलग-अलग अनुशासनों के लोगों के आने से भी हासिल हुआ है। हमारी आज की
कथापीढ़ी हिन्दी कहानी की विकासयात्रा में अबतक की सबसे काबिल पीढ़ी के रूप में उभर
रही है यह कहना किसी भी तरह से अतिरंजना में कहना नहीं है। आज हिन्दी कहानी का
अनुभव जगत जितना समृद्ध हुआ है उतना इससे पहले नहीं संभव हो सका था। 1990 के असपास
से देश-दुनिया का जो नक्शा बन रहा था,उस
नक़्शे ने हमारा बहुत कुछ नष्ट किया है।
उसने जितना दिया है उससे कई गुना ज्यादा हमसे लिया है। इस ‘लिए की’ पीड़ा को सबसे मजबूती से जिस विधा ने व्यक्त किया है वह
कहानी है। हिन्दी कहानी ने एक विधा के रूप
में अपने सौ-सवा सौ वर्षों की विकासयात्रा में कई पड़ाव पार किया है। इनमे वह
लगातार अपने युगबोध से टकराती रही है। हिन्दी कहानी ने अपनी विकासयात्रा में अपने
कहानीपन को बचाए रखते हुये लोकजीवन की विडंबनाओं और विसंगतियों को व्यक्त किया है।
यहाँ यह बात कहाँ भी जरूरी लगता है कि हिन्दी आलोचना ने कहानी को हमेशा से कविता
और उपन्यास के सामने कमतर आँका है जबकि मुझे ऐसा लगता है कि कई बार हिन्दी कहानी
ने वह काम किया है जो कविता या उपन्यास भी नहीं कर पाये हैं। आज के हिन्दी कहानी
के परिसर को देखते हुये कहा जा सकता है कि संघर्ष और प्रतिरोध की चेतना के संदर्भ
में कहानी कविता के समानान्तर चलने वाली विधा है। उसपर यह झूठा इल्जाम है कि वह मन
बहलाने की चीज है। कहानी मन में बेचैनी भी पैदा करती है।
हिन्दी
कहानी के समकालीन परिदृश्य में जिन कथाकारों ने मुझे अपने लेखन से प्रभावित किया।
हिन्दी कहनी में जिनकी उपस्थिति मुझे जरूरी लगती है। जिनके न होने की स्थिति में
कुछ ऐसा है जो लगता है कि छूट जाता उनमे एक जरूरी नाम मो. आरिफ का है। मो. आरिफ़ के
अबतक ‘फिर कभी’ , ‘फूलों का
बाड़ा’ और ‘चोर सिपाही’ नाम से तीन कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उन्होने ‘उपयात्रा’ नाम से एक उपन्यास भी लिखा है। इसके अतिरिक्त दूसरी
विधाओं में भी कुछ-कुछ लिखने के साथ ही वे अँग्रेजी में भी लिखते हैं। उनसे और
उनके लेखन से वाकिफ लोग यह जानते हैं कि मात्रात्मक रूप से देखा जाए तो मो. आरिफ़
ने बहुत कम कहानियाँ लिखी हैं। उनकी उम्र तक आते-आते लोगों के कई-कई संग्रह
प्रकाशित हो जाते हैं,या वे कहानी का क्षेत्र छोडकर उपन्यास की तरफ चले जाते
हैं। आरिफ़ जी ने दोनों में से एक भी नहीं किया, बावजूद उन्हे दर्ज किए बिना समकालीन हिन्दी कहानी पर कोई बात पूरी नहीं
होती। उपयात्रा नाम से एक उपन्यास लिखने और दूसरी विधाओं में भी पर्याप्त लेखन
करने के बाद भी मो. आरिफ़ की मूल पहचान एक
कहानीकार की है। एक ऐसे कहानीकार की जो अपने समय-समाज के अलक्षित प्रदेश की कथा कह
रहा है।
अब यहाँ
सवाल है कि मो. आरिफ़ जिस अलक्षित प्रदेश की कथा कह रहे हैं वह अलक्षित प्रदेश है
क्या? तो आइये पहले मो. आरिफ के प्रदेश को जान लेते हैं, फिर अलक्षित प्रदेश की ओर चलते हैं। मो.आरिफ़ जिस सामाजिक पृष्ठभूमि से आते
हैं उसका उनके कथा-ढांचे पर पर्याप्त प्रभाव है। हर रचनाकार की सामाजिक पृष्ठभूमि
का असर उसकी रचनाशीलता पर होता है,लेकिन मो. आरिफ़ अपनी रचना का जीवद्रव्य वहीं से सीधे तौर पर ग्रहण करते हैं। उनकी
कहानियों में अवध और मुस्लिम समाज बहुत मुखरता से अभिव्यक्त होता है। समकालीन
कथाकारों में बहुत कम कथाकार ऐसे हैं जो मुस्लिम समाज की सामाजिक-संरचना को व्यक्त
करने में सफल हो रहे हैं। आज के समय में इस महादेश में मुस्लिम जीवन पर लिखना और
कठिन हो गया है, बल्कि ख़तरनाक हो गया है। मुस्लिम जीवन पर लिखना और उसकी
सामाजिक-संरचना को व्यक्त करना दोनों दो बातें हैं। अब्दुल बिस्मिल्लाह और मंजूर
एहतेशाम के बाद समकालीन कथा में मुस्लिम समाज की सामाजिक-संरचना को जिस कथाकार
ने व्यक्त किया है वह मो. आरिफ हैं। मो.
आरिफ का कथाढांचा तो हिन्दी का पारंपरिक कथाढांचा है लेकिन उसमें वे जिस तरह का प्रयोग
करते हैं वह उन्हें दूसरे कथाकारों से अलग करता है।
जब मैं
यह कह रहा हूँ कि मो. आरिफ़ मुस्लिम समाज की सामाजिक-संरचना को अपनी कहानियों में
दर्ज करते हैं तो इसका यह मतलब नहीं है कि मैं मुस्लिम समाज को किसी भी तरह से
भारतीय समाज की सामाजिक-संरचना से अलग कोई इकाई मानकर कह रहा हूँ। भारत का मुस्लिम
समाज किसी भी रूप में भारतीय सामाजिक-संरचना से अलग कोई इकाई नहीं है। जिस तरह हम
एक खास तरह की पहचान वाले लोगों को हिन्दू समाज के लोग कहते हैं उसी तरह भारतीय
संदर्भ में एक खास तरह की पहचान रखने वाले लोगों को मुस्लिम समाज के लोग कहा जाता है। इस पहचान में कुछ तो ऐसा है जिसकी
वजह से भारतीय मुसलमान दुनिया के दूसरे देशों के मुसलमानों से भिन्न है। इस
भिन्नता के तमाम पहलुओं में एक पहलू यहाँ की साझी सांस्कृतिक विरासत भी है। मो. आरिफ़
जिन लोगों की कथा कहते हैं वे सब समवेत रूप से भारतीयता का प्रतिनिधित्व करने वाले
लोग हैं। इस प्रतिनिधित्व की चर्चा यहाँ इसलिए भी जरूरी है क्योंकि पिछले कुछ
सालों में जिस तरह हिन्दू को और ज्यादा हिन्दू और मुसलमान को और ज्यादा मुसलमान
बनाने की कोशिश हो रही है उसमें इस तरह की कहानियों की चर्चा ज्यादा जरूरी हो जाती
है जिसमें हिन्दू और मुसलमान के साझेपन की कथा कही गयी हो। मो. आरिफ़ की कहानियाँ
हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति के साझेपन की कथा कहने वाली कहानियाँ भी हैं। इनकी
कहानियों में अवध की संस्कृति की सामासिकता मौजूद दिखती है।
भारतीय
स्वाधीनता आंदोलन के दौर से ही अवध जिस तरह साझेपन की मिशाल पेश करता आया है वह अन्यत्र दुर्लभ है। तमाम बार
तो ऐसा लगता है कि अवध की जमीन में ही कुछ ऐसा है जो इतने लंबे संघर्ष के बावजूद
साझेपन को बचाए हुये है। मो. आरिफ़ को पढ़ते हुये उस साझेपन की खुशबू आती है। इनकी
कहानियाँ अवध की उस साझी संस्कृति को आवाज देती हैं जिसकी जमीन बेहद उर्वर है। मो.
आरिफ़ की कहानियों को पढ़ते हुये प्रेमचंद और भीष्म साहनी की याद बार-बार आती है।
कहानी कहने का सलीका उन्हे अखिलेश से जोड़ता है। उनकी कहानियाँ बतकही का आनंद देती
हैं। इस आनंद के बीच जब वे अपने समय के जटिल और विद्रूप यथार्थ को दर्ज करते हैं
तो पाठक बेचैन हुये बिना नहीं रह पाता।
मो. आरिफ़ की कहानियों में भारत के मध्यवर्गीय और निम्न-मध्यवर्गीय ग्रामीण
और कस्बाई जीवन का यथार्थ व्यक्त हुआ है। उनकी कहनियों को पढ़ते हुये भारतीय गांवो
और कस्बों की विविध छवियाँ एकसाथ दिखाई देती हैं। इन कहानियों में हमारे आज के समय
की धड़कनें हैं। बाजार का बढ़ता प्रभाव है,यांत्रिक
होती हुई दुनिया का सच है, इमोशनलेस
होता हुआ समाज है। समाज में बढ़ रही सांप्रदायिकता है। कमजोर हो रहे रिश्ते हैं।
स्वतन्त्रता,समानता और बंधुत्व के नाम पर मिली आजादी और उसकी
लोकतान्त्रिक सरकारें हैं। लोकतन्त्र का विद्रुप चेहरा है। यह चेहरा लंबे समय में
निर्मित हुआ है। उसकी निर्मिति के पीछे की
क्या वजहें रही हैं और उसमें किनका हाथ ज्यादा है यह बहस का विषय हो सकता है। एक
कथाकार के लिए ज्यादा जरूरी है उसका यथार्थ रूप व्यक्त करना और यह कहने में कोई
हर्ज नहीं है कि मो. आरिफ़ ने उसके यथार्थ रूप को बहुत ईमानदारी से व्यक्त
किया है। मो. आरिफ की प्रायः सभी कहानियों में भारतीय लोकतन्त्र के इस विद्रूप
चेहरे का दर्शन हो जाता है। उनकी कुछ कहानियों के कथ्य का संदर्भ लेते हुये हम यह
देखने की कोशिश करते हैं कि स्वाधीनता के पश्चात बन रहे भारतीय राष्ट्र-राज्य की
संकल्पना को मो. आरिफ़ की कहानियाँ किस तरह व्यक्त करती हैं? भारतीय राष्ट्र-राज्य की इस लोकतान्त्रिक संकल्पना में आमजन की उपस्थिति
कहाँ है? साथ ही हम यह भी देखने की कोशिश करेंगे कि 1990 के
आसपास से देश-दुनिया के नक्शे में जिस तरह का बदलाव हो रहा था उस बदलाव के
साथ मो. आरिफ़ का ट्रीटमेंट कैसा है? पहले कुछ कहानियों के कथ्य को देखते हैं।
मो.
आरिफ़ के कहानी संग्रह 'फूलों का
बाड़ा' में एक कहानी संकलित है 'लू' नाम से। लू कहानी भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था में
पुलिस प्रशासन के दमनकारी रवैये की कहानी है। यह कहानी शुरू होती है इंस्पेक्टर
चौहान के मुंबई से चलकर पूर्वाञ्चल दौरे पर आने से। उनका यह दौरा एक कुख्यात
अपराधी को पकड़ने के लिए है। उन्हे इस्लामपुर जाना है जो कि बेला गंज से छः
किलोमीटर दूर है। दोपहर के वक्त बेलागंज से इस्लामपुर को जाने का कोई साधन नहीं
मिलता है। अचानक इंस्पेक्टर साहब को एक रिक्शा आता हुआ दिखाई देता है। वे उससे
इस्लामपुर चलने को कहते हैं। मामूली ना-नुकुर के
बाद वह जाने को तैयार हो जाता है। रास्ते में इंस्पेक्टर साहब को धूप की
वजह से लू लग जाती है। रिक्शेवाला उन्हे अपने घर ले जाता है जो कि बेलागंज और
इस्लामपुर के रास्ते में पड़ता है। वहाँ वह अपनी पत्नी से पना बनवाकर पिलाता है।
इंस्पेक्टर की तबीयत ठीक हो जाती है,लेकिन उनमे
इतनी ऊर्जा नहीं है कि वे इस्लामपुर जा सकें। वे रात रिक्शेवाले के यहाँ ठहरते
हैं। सुबह बिना बेलागंज गए वापस मुंबई जाने को तैयार हो जाते हैं। रिक्शावाला
उन्हे बेलागंज ले जाता है। रास्ते में इंस्पेक्टर और रिक्शेवाले बातचीत करते हुये
जाते हैं। बेलागंज पहुँचने से थोड़ा पहले इंस्पेक्टर का तेवर अचानक बदलता है। वे
रिक्शे से कूदकर रिवाल्वर निकाल लेते हैं और रिक्शेवाले को गालियाँ देते हुये
हथकड़ी पहना देते हैं। रिक्शेवाला हाथ-पाँव जोड़ता है। उससे क्या गलती हुई जानना
चाहता है लेकिन इंस्पेक्टर साहब गालियों की बौछार के साथ ही लात-घूसा भी चलाने
लगते हैं यह कहते हुये कि ‘चल साले
मुंबई की जेल की हवा खा।.... मर्डर करके पुलिस से छुपता है।
इस
कहानी को पढ़ते हुये भारतेन्दु हरिश्चंद का ‘अंधेर नगरी’ नाटक और हरिशंकर परसाई की ‘इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर’ नामक
कहानी सहज ही याद आ जाती है। लोकतान्त्रिक व्यवस्था में हमने एक ऐसा प्रशासक वर्ग
पैदा किया है जो आज भी तानाशाह बनकर काम करता है। उसी तानाशाही प्रवृत्ति के
संदर्भ को व्यक्त करने वाली कहानी है लू। यह कहानी भारतीय न्याय व्यवस्था पर एक
करारा चोट है। यह कहानी न्याय व्यवस्था पर चोट करते हुये हमारे समाज की मानवीय
चेतना को भी उजागर करती है। चिलचिलाती धूप में जिस रिक्शेवाले ने लू से बचाने के
लिए अपने घर ले जाकर पना पिलाया, अपराधी न
मिलने की स्थिति में उसी रिक्शेवाले को अपराधी बनाकर मुंबई ले जाने वाली मानसिकता
को हम किन मानवीय मूल्यों की तराजू पर तौलें? इसी तरह दूसरी कहानी है 'तार'। तार कहानी एक ऐसे मुस्लिम परिवार की कहानी है जिसका
पारंपरिक पेशा सुगंधित तेलों का व्यापार करना है। यह कहानी जिस परिवार की है उसके
आदिपुरुष(आदिपुरुष इस मामले में कि कहानी कई पीढ़ियों की है तो जिनसे यह कहानी शुरू
होती है उन्हे आदिपुरुष कहना ही उचित जान पड़ता है।) ने 1857 के समय में एक लड़की को
भगाकर उससे शादी कर ली थी। शादी के बाद एक हिन्दू परिवार में आश्रय मिला। वहीं
रहते हुये तेलों के व्यापार का काम सीखा। जिस परिवार में आश्रय मिला उस परिवार की
लड़की सुमन्ती देवी उनपर आशक्त हो गईं। उस हिन्दू लड़की से भी बाद में रुकैया बानो
की सहमति से निकाह कर लिया। यह कहानी उस परिवार के जिस पीढ़ी की है वह आज़ाद भारत में रहता है और आदिपुरुष
का वंशज है। उनके आसपास रहने वाले हिंदुस्तानी मुसलमानों का विचार है कि ये लोग
उसी हिन्दू पत्नी के वंशज हैं। उस मुहल्ले में रहने वाले हिंदुस्तानी मुसलमान उस
परिवार को काफिर की नजर से देखते हैं। कथाकार कहानी को जहां से अपने हाथ में लेता
है वहाँ का सच यह है कि तेलों का धंधा करते हुये रहमान पर तरह-तरह के इल्जामात
लगाए गए। जिसमें उनके संबंध पाकिस्तान से
है और इधर से तेल भेजा जाता है उधर से बरबादी का लिक्विड भरकर आता है जैसे इल्ज़ाम
भी शामिल हैं। यह सब सहने और झेलने के क्रम में अपने दादा की ही तरह जिद्दी रहमान
ने तय किया कि अब वे सुगंधित तेलों का व्यापार छोडकर लाटरी का टिकट बेचने का धंधा
शुरू करेंगे। कथाकार ने शुरू में ही कहा कि रहमान जिद्दी हैं अपनी जिद में उन्होने
लाटरी कि दुकान का नाम 'अल फ़ायदा
लाटरी सेंटर' रख दिया। जैसा कि नैरेटर को पूर्वाभास था यह बोर्ड लगते
ही एसटीएफ और सीआईडी रहमान भाई के दरवाजे पर। अपनी तरह से तमाम पूछताछ के बाद
रहमान को पुलिस थाने ले जाया गया। यह कहानी
नैरेटर के दुःस्वप्न से खत्म होती है। दुःस्वप्न क्या है- ''सपने में रहमान भाई को देखा। उन्हे
तीन गोलियां मारी गयी थीं। एक सिर में,एक सीने में और एक मुंह में। उनकी लाश जहां पड़ी थी वहीं मोर छाप तेल की
असंख्य खाली शीशियाँ बिखरी पड़ी थीं और पुलिस वाले उनपर लाठियाँ बरसा रहे थे। मुझे
डर है कि यह सपना कहीं सच न हो जाए। आखिर आजकल सपनों के सच होने में वक्त ही कितना
लगता है''। कहानी का जो कथ्य है उसका इस दुःस्वप्न के साथ अंत आज की तारीख में बहुत
कुछ कहता है। यह कहानी हमारे देश के यथार्थ यथार्थ को व्यक्त करने वाली कहानी जान
पड़ती है। हमने इस महान हिंदुस्तान की महान परंपरा की महानता से अर्थ ग्रहण करते
हुये जो वर्तमान बनाया है उसमें पहलूखान और जुनैद जैसे बहुतेरे लोग हैं जो सिर्फ
शक की बिना पर मार दिये जाते हैं। उनका कसूर सिर्फ यह होता है कि वे साझी विरासत वाले इस महान देश
में गैर-हिन्दू घरों में पैदा हो गए। तब जबकि इस देश में मुसलमान होना अपराधी होने
का पर्याय होता जा रहा है इस तरह की कहानियों की प्रासंगिकता और बढ़ती जाती है। ये
कहानियाँ हमारी महानता की गाथा गाने वालों से सवाल करती हैं। जब-जब यह देश अपनी महनता की गाथा गाना चाहता है
तब-तब ये कहानी आईना दिखाती है। यह कहानी से ज्यादा एक आईना है जिसमें आपको अपनी
शक्ल देखनी चाहिए। आपको पहलूखान को देखना चाहिए,जुनैद को देखना चाहिए,उन
तमाम-तमाम लोगों को देखना चाहिए जिनके साथ इस लोकतान्त्रिक देश में न्याय नहीं हुआ
और विचार करना चाहिए कि हमारी वास्तविक स्थिति क्या है।
मो.
आरिफ़ एक ऐसे कथाकार हैं जिन्होने अपनी रचनात्मकता के लिए हमेशा नई जमीन की तलाश की
हो ऐसा नहीं है। वे कथा कहने की पुरानी
प्रविधि और प्रयुक्त हो चुके कथ्य में भी
नयापन लाने का माद्दा रखने वाले कथाकार हैं। इस संदर्भ में मैं उनकी दो कहानियों
की चर्चा करना चाहता हूँ। एक तो उनकी बहुचर्चित कहानी 'चोर सिपाही' है औटर दूसरी कहानी है 'आग'।
चोर
सिपाही कहानी सांप्रदायिकता पर केन्द्रित कहानी है। सांप्रदायिकता की समस्या पर
हिन्दी के लगभग सभी कथाकारों ने लिखा है। आज़ाद भारत का कोई बिरला कथाकार ही होगा
जिसने इसपर कहानी न लिखी हो। कथाकारों के बीच सबसे लोकप्रिय विषयों में से एक
सांप्रदायिकता की समस्या है। इसकी लोकप्रियता की वजह इसकी अखिल भारतीय व्याप्ति भी
हो सकती है। दूसरी वजह कि आज़ाद भारत में भारतीय जन-जीवन को सांप्रदायिकता ने जिस
तरह और जितना प्रभावित किया है उतना किसी और ने नहीं। इसलिए भी कथाकारों का ध्यान
उधर सबसे ज्यादा गया है। सांप्रदायिकता के बहुतेरे रूप हैं। हर रूप में वह मानवता
विरोधी अभियान है। आज यह अपने वीभत्स रूप में हमारे सामने उपस्थित है।
सांप्रदायिकता जैसे बहुप्रचलित विषय पर लिखते हुये भी मो. आरिफ की कहानी अलग से
ध्यान खींचती है। यह कहानी अपने कथ्य से ज्यादा अपने प्रयोगधर्मी शिल्प की वजह से
याद की जाएगी। यह कहानी डायरी शैली में लिखी गयी है। डायरी भी एक छोटे से बच्चे की
है। बच्चा इलाहाबाद से अपने मामा के यहाँ अहमदाबाद जाता है तबतक अचानक से दंगा भड़क
जाता है। दंगे के समय मुस्लिम बस्ती के लोगों की मनःस्थिति और उनके करी-व्यापार का
जिस यथार्थ ढंग से अंकन किया गया है वह अन्यत्र दुर्लभ है। दंगे के समय हिन्दू और
ज्यादा हिन्दू और मुसलमान और ज्यादा
मुसलमान हो जाता है। यहाँ भी सीन कुछ ऐसा ही है। इस कहानी की दो घटनाएँ
पाठक को विचलित कर देने वाली घटनाएँ हैं।
एक तो जब पराग मेहता को गाँव वाले पकड़ कर इस्माइल के घर लाते हैं और गुलनाज
उसे पहचानने से इंकार कर देती है (गुलनाज पराग की प्रेमिका है। पराग गुलनाज से
मिलने आया था,वापस जाते वक्त मुसलमानों ने संदेह की वजह से उसकी पिटाई
की। उसने इस्माइल के यहाँ आने की बात कही जिसकी जांच के लिए लोग इस्माइल के घर आए,लेकिन जिसे उसका आना मालूम था उसने ही इंकार कर दिया) दूसरी कहानी के अंतिम दृश्यों की घटना जब
मानसुख पटेल आते हैं और देखते हैं की इस्माइल बेड के नीचे छिपे हैं।(इस्माइल और
मानसुख बचपन के बहुत गहरे दोस्त है) साम्प्रदायिक दंगे किससे-किससे क्या-क्या छिन लेते हैं इसे वही जान सकता है जिसने उसका
दंश झेला हो। यूं कहानियाँ पढ़ा-सुनकर तो सिर्फ अनुमान भर लगाया जा सकता है।
इस
संदर्भ में मैं जिस दूसरी कहानी की चर्चा करना चाहता हूँ वह है आग। आग कहानी पढ़ते
हुये धर्मवीर भारती की कहानी 'बंद गली का
आखिरी मकान' की याद बरबस ही हो आती है। इन दोनों कहानियों में गजब
की समानता है। कथ्य की समानता होते हुये भी मो. आरिफ की कहानी धर्मवीर भारती की
कहानी से आगे की कहानी है। धर्मवीर भारती की कहानी जहां विवाह,विच्छेद और संतति के समक्ष विवाहेतर सम्बन्धों की स्वीकृति की समस्या तक
खुद को केन्द्रित रखती है वहीं मो. आरिफ
की कहानी में स्त्री विमर्श के नए रूप भी हमारे सामने आते हैं। मो. आरिफ की यह
कहानी हमे बताती है की पेट्रीयार्की का संबंध
सिर्फ पुरुष तक केन्द्रित है ऐसा नहीं है। जिस तरह ब्राह्मणवाद का संबंध
सिर्फ ब्राह्मण से नहीं है उसी तरह पेट्रीयार्की का संबंध सिर्फ पुरुष से नहीं है।
ब्राह्मणवाद की ही तरह यह भी एक खास तरह की मानसिक अवस्थिति का नाम है जिसकी जद
में स्त्री भी आ सकती है।
कहानी
का सार संक्षेप यूं है कि परिवार की प्रताड़णा का शिकार हुई एक स्त्री को जब घर में
ही जलाकर मार डालने की कोशिश की जाती है तो वह बच जाने के बाद अलग रहने का राश्ता
चुनती है। उसके दो बेटे हैं। बड़ा बेटा बड़ा होकर नौकरी करने लगता है उसे एक लड़की से
प्रेम हो जाता है। वह उससे शादी करना चाहता है। इस आशय की बात वह अपनी माँ से करता
है। माँ तैयार हो जाती है लेकिन उसकी शर्त है कि वह दहेज लेगी। बिना दहेज लिए उसे
शादी करना कबूल नहीं है। जो माँ दहेज की वजह से ही लगातार प्रताड़ित की जाती रही
वही माँ अपने बेटे की शादी बिना दहेज के करने से साफ मना कर देती है। कहानी में एक
जगह बेटे की आत्मस्वीकृति है -''जिस आग में
माँ जली थी,जिस आग में पिता और उनके घरवालों ने माँ को जलाकर मार
डालने की कोशिश की थी,जिसकी
लपटों में हम दोनों भाई वर्षों से झुलस रहे थे, और जिसकी आंच और ताप ने एक बाहरी व्यक्ति को माँ का सच्चा हितैषी बना दिया
था..... वह आग तो उनके अंदर लगी ही नहीं थी''। कहानी में
यह स्वीकृति असल में उस माँ के भीतर मौजूद पेट्रीयार्की के लक्षणों की सूचक है। यह
कहानी वही व्यक्ति लिख सकता है जिसको भारत की सामाजिक-संरचना की ठीक-ठीक समझ हो।
इस मामले में मो. आरिफ का कोई जवाब नहीं है। उनकी अधिसंख्य कहानियाँ भारतीय समाज
की सामाजिक-संरचना के यथार्थ को व्यक्त करने वाली कहानियाँ होती हैं। इस संदर्भ में फूलों का बाड़ा, फुर्सत,अंतिम अध्याय,सत्यमेव
जयते, साइकिल की सवारी, पापा का चेहरा आदि कहानियों का उल्लेख करना समीचीन लगता है। ये सभी
कहानियाँ भारत के मध्यवर्गीय ग्रामीण-कस्बाई संस्कृति की कहानियाँ हैं। इन
कहानियों से गुजरते हुये नब्बे के बाद विकसित हुई भूमंडलीकृत दुनिया का जीवन
यथार्थ देख सकते हैं। बेरोजगारी,युवामन कि
बेचैनी , मध्यवर्गीय परिवार की पारिवारिक स्थिति आदि इन कहनियों
के केंद्र में हैं।
मो.
आरिफ की कहानियों को पढ़ते हुये बार-बार उनके शिल्प की तरह ध्यान जाता है। हिन्दी
कहानी में उदय प्रकाश के बाद कहानी के शिल्प के साथ अगर किसी कथाकार ने सबसे
ज्यादा प्रयोग किए हैं तो उनमे मो. आरिफ का नाम पहले स्थान पर होना चाहिए। मो.
आरिफ की कोई दो कहानी ऐसी नहीं है जो एक तरह के शिल्प मे लिखी गयी हो। मजेदार बात
तो यह है कि उनका यह प्रयोग उदय प्रकाश की तरह कहानी को ढकने की कोशिश में किया
गया बेवजह का कौतुक नहीं लगता है। मो. आरिफ के प्रयोग कहानी के भीतर से विकसित हो
रहे कथातन्तु की तरह दिखते हैं। उनकी कहानियाँ हमारी समकालीन सामाजिक-राजनैतिक
संरचना को समझने का एक माध्यम मालूम पड़ती हैं। इन कहानियों में हमारा युगसत्य
स्पंदित होता हुआ दिखता है। यह दिखना उनके एक प्रतिबद्ध कथाकार होने की निशानी है।